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दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त, वेदों-शास्त्रों, पुराणों के ज्ञाता, तांत्रिक क्रियाओं के अनुभवी एवं ज्योतिष तथा M.B.A.

Pandit Sunil Upadhyay 

 हमारे जीवन में एक के बाद एक समस्याऐं क्यों आती हैं?

1. पितृदोष के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता हैं।  

पितृदोष के कारण हमारे घरों मंे छोटी-छोटी बातों पर लडाईयां होती हैं। पारिवारीक एकता समाप्त हो जाती हैं। यदि अधिक पितृदोष होता है तो वार-त्यौहारों पर भी लडाईयां होती हैं। जिन परिवारों में पितृदोष रहता हैं वहां से सुख-शांति एवं बरकत दोनो ही चलीं जाती हैं। धन कितना भी कमाओ टिकता ही नहीं हैं। पितृदोष के कारण विवाह-सगाई आदि मंे भी भयंकर रूकावटें आने लग जाती हैं। फिर योग्यता होते हुए भी नौकरी नहीं मिलती हैं अथवा घर के किसी सदस्य का मन कमाने में नहीं लगता हैं। अथवा संतान बिगड जाती हैं। अति-पितृदोष के कारण पति-पत्नि कभी भी सुख से नहीं रह पाते हैं। पितृदोष के कारण बेटा दुखी रहता हैं या बहू घर छोडकर चली जाती हैं। अथवा विवाह के बाद बेटी दुखी रहती हैं या पिता के घर आ जाती हैं। फिर धन अथवा संतान से सुख नहीं मिल पाता हैं। धन व्यर्थ के कार्यों में अधिक खर्च होने लगता हैं। ऋण, बीमारीयां, दुर्घटनाऐं, शत्रुओं से आयेदिन विवाद, पुलिस, कोर्ट-कचहरी के चक्कर आदि समस्याऐं होना आम बात हो जाती हैं। जिन घरों में पितृदोष रहता हैं वहां इनमें से एक न एक समस्या अवश्य रहती हैं। फिर पितृदोष बढता ही जाता हैं एवं मरते दम तक समस्याऐं पीछा नहीं छोडती हैं। जिन घरों में अकालमृत्यु हो जाती हैं अथवा मां-बाप से पहले बच्चे मर जाते हैं वहां पितृदोष अवश्य होता हैं। घर के किसी सदस्य को कभी-कभी सपने में यदि सांप दिखाई देते हों अथवा मरे हुए पूर्वज दिखाई देते हों तो यह पितृदोष का बहुत बडा संकेत होता हैं। पितृशांति तथा पितृमोक्ष में बहुत अधिक अंतर होता हैं। पितृमोक्ष होने से जीवन की संपूर्ण समस्याऐं धीरे-धीरे अपने-आप हल होने लग जाती हैं। अन्यथा एक समस्या दूर करो तो दूसरी समस्या तुरंत खडी हो जाती हैं। याद रखिए समस्याओं का कारण दूर नहीं होगा तो समस्याऐं बढती ही जाएगीं कम नहीं होगीं।  

2. तांत्रिक क्रियाऐं जीवन को नर्क बना देती हैं।

विद्वेषण जैसी खतरनाक तांत्रिक क्रियाओं द्वारा पति-पत्नि में झगडे करवा दिए जाते हैं फिर वे ही एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। ताडन जैसी भयानक तांत्रिक क्रियाओं द्वारा व्यक्ति को बीमार कर दिया जाता हैं। फिर बीमारी ही पकड में नहीं आती है अथवा इलाज करवा-करवा कर थक जाते हैं फिर भी लाभ नहीं होता हैं। स्तंभन जैसी तांत्रिक क्रियाओं एवं टूने-टोटकों द्वारा व्यापार-व्यवसाय ट्रक-बस खेती आदि को बंाध दिया जाता है जिससे धन की आवक एवं ग्राहकी कम हो जाती हैं। कर्ज बढता ही जाता हैं एवं अंत में लाखों-करोडों का घाटा हो जाता हैं। मारण प्रयोग अर्थात् मूठ द्वारा व्यक्ति को मार दिया जाता है। ठंडी मूठ मार दी जाती है तो व्यक्ति बहुत समय तक बीमार रहता है फिर तडप-तडप कर मर जाता है। उच्चटान जैसी तांत्रिक क्रियाऐं एवं टूने-टोटके घरों में कर दिये जाते हैं तो फिर घरों में उच्चाटन होने लग जाता है अर्थात् घरों में छोटी-छोटी बातों पर लडाई-झगडे होने लग जाते हैं। फिर घर से सुख-शांति एवं बरकत दोनो ही चली जाती हैं। फिर धन व्यर्थ के कार्यों में ही खर्च होता रहता है। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे पूरा घर बर्बाद हो जाता हैं। वशीकरण द्वारा स्त्री-पुरूषों अथवा लडके-लडकियों को वश में कर लिया जाता है अर्थात् उनकी बुद्धि बांध दी जाती है जिससे वे वही करते हैं जो उन्हे वश में करने वाला कहता हैं। वश में किया हुआ व्यक्ति अपना भला-बुरा कुछ भी नहीं समझ पाता हैं। वह व्यक्ति मान-मर्यादा को त्यागकर कई गलत कदम उठा लेता हैं। परिणाम यह होता है कि जीवन नर्क बन जाता हैं। तांत्रिक मंत्रों द्वारा कुछ वस्तु सिद्ध कर लि जाती है फिर उसे मिठाई शराब अथवा पान में खिला दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति में शराब दूसरी स्त्रियों अथवा वैश्याओं का संग जैसी कई बुरी आदतंे जाती है। फिर उस व्यक्ति के कारण घर वालों का जीना हराम हो जाता है। तांत्रिक क्रियाओं द्वारा स्त्रीयों की कोख भी बांध दि जाती है फिर उन्हें कभी संतान नहीं हो पाती हैं। कई बार मारण प्रयोग डिलेवरी के समय कर दिया जाता है तो बच्चा जन्म लेने के बाद बीमार हो जाता हैं एवं कभी-कभी तो उसकी अकालमृत्यु भी हो जाती हैं।  तांत्रिक क्रियाओं द्वारा स्त्रीयों के मासीक धर्म संबंधी रोग गुप्त रोग एवं असाध्य रोग भी उत्पन्न कर दिये जाते हैं। जैसे कांटे से ही कांटा निकलता है तलवार से नहीं। ठिक उसी प्रकार तांत्रिक क्रियाओं की शांति केवल तांत्रिक मंत्रों द्वारा ही हो सकती हैं। दान-पुण्य पूजन-पाठ करवाने से नहीं। यदि तांत्रिक क्रियाओं का निराकरण या समाधान समय पर नहीं होता है तो व्यक्ति मौत के मुंह में पहंुच जाता है व्यापार-व्यवसाय खेती सब कुछ बरबाद हो जाता हैं एवं जीवन नर्क बन जाता हैं। 

 

3. कालसर्प दोष कार्यों एवं उन्नति में सबसे बडा बाधक होता हैं।       

जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली या जन्मपत्रिका में कालसर्प दोष होता हैं उसके भाग्योदय नहीं हो पाता हैं। विद्या प्राप्ति में बाधाऐं आती हैं। विवाह नहीं हो पाता अथवा वैवाहिक संबंध टूट जाते है। मन में सदैव निराशा बनी रहती है। व्यक्ति अधिक परिश्रम करने के बाद भी धन का संचय नहीं कर पाता। व्यक्ति सदैव किसी किसी रोग से ग्रस्त रहता है। एक के बाद एक मुसीबतों का सामना करना पडता हैं।  भयंकर कठिनाई में जीवन व्यतीत होता हैं। आत्महत्या के विचार आते हैं। व्यक्ति का जीवन संघर्षमय होता है। सदैव आर्थिक संकट से परेशान होना पडता हैं। अत्यधिक खर्च होता रहता हैं। दिमाग में गुस्सा भरा रहता है। व्यक्ति हमेशा कर्ज के बोझ सेें दबा रहता है। नौकरी में पदोन्नति नहीं होती है। कोर्ट.कचहरी में हानी उठानी पडती है। हमेशा असफलता मिलती है।

 

4. मंागलिक होने के कारण शादी में रूकावटें तथा विवाह के बाद का जीवन दुखी रहता हैं।

मंगल दोष के कारण विवाह-सगाई में भयंकर रूकावटें आती हैं। रिश्ते नहीं होते या बतने-बनते टूट जाते हैं। विवाह के बाद भी पति-पत्नि के जीवन में हमेश मनमुटाव, क्लेश एवं अशांति बनी रहती हैं। नौकरी, विवाह-सगाई एवं विद्या प्राप्ति में भयंकर रूकावटें आती हैं। मंगल की अशुभता के कारण व्यक्ति स्वयं अपने हाथों से अपना कार्य बिगाड लेता है। व्यक्ति के कार्य बनते-बनते बिगड जाते है। धन प्राप्ति में विध्न-बाधाएं आती हैं एवं ऋण से भी जल्दी छूटकारा नहीं मिलता। संतान नहीं होती हैं अथवा संतान प्राप्ति में विलंब होता हैै। व्यक्ति को कभी-कभी अत्यधिक क्रोध अर्थात् गुस्सा बहुत आता हैं। व्यक्ति को जीवन में अधिक परिश्रम करना पडता है फिर भी सफलता बहुत ही कम मिल पाती है। व्यक्ति को मित्रों, संबंधियों आदि से धोखा मिलता है। व्यक्ति कितना भी अच्छा काम कर ले परंतु उसको यश की प्राप्ति नहीं होती। धन का अधिक व्यय करता हैं। यहां तक की मंगल की अशुभता के कारण तलाक भी हो जाता है अथवा पति-पत्नि में से कोई एक मर भी जाता हैं। पति या पत्नि में से कोई एक परायी स्त्रीयों अथवा पराये पुरूषों से संबंध रखने लग जाता हैं। अथवा शराब जैसी बुरी आदतों में जीवन बरबाद करने लग जाता हैं। अथवा शराब जैसी बुरी आदतों से जीवन बरबाद कर देता हैं। 

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