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वेदों-शास्त्रों, पुराणों के ज्ञाता, तांत्रिक क्रियाओं के अनुभवी एवं ज्योतिष तथा M.B.A.

Pandit Sunil Upadhyay

आखिर हम सुखी क्यों नहीं हो पाते हैं? क्योंकि हम सच्चाई नहीं जानते हैं?

मनमाने ढंग से कि गई पूजन-पाठ सिर्फ दुख ही देती हैं।  

 

अक्सर देखा जाता हैं कि इस दुनिया मंे पूजन-पाठ करने वाले लोग ही दुखी हैं और जो पूजा-पाठ नहीं करते वे लोग सुखी हैं। लोग अंधाधूंध तरीके से घंटों तक पूजन-पाठ करते हैं और उन्हें पता नहीं होता है वे प्रतिदिन पूजन-पाठ में अनेकों गलतियां कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप उन्हें दुख ही प्राप्त होता हैं। फिर जितनी ज्यादा पूजन-पाठ करो उतने दुखी ही होते जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार पूजन-पाठ करने के कुछ नियम-तरीके आदि होते हैं यदि हम उनके अनुसार पूजन आदि करें तो सुखी हो सकते हैं अन्यथा लोगों का जीवन नर्क बन जाता हैं। कहा जाता हैं

एक साधे सब सधै सब साधै सब जाये। 

अर्थात् किसी एक इष्टदेव की पूजन कर लो उन्हें प्रसन्न कर लो सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं। परंतु यदि सभी की पूजन करने लगो तो सबको साधना अर्थात् सबकी पूजन करना अत्यंत कठिन हैं क्योंकि सबके नियम पालना असंभव जैसा होता हैं। परिणाम यह होता है कि बरसों पूजन करने के बाद दुख के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता हैं। ऐसे लोगों को दस जगह गड्ढा खोदने की आदत होती हैं। कभी-कभी तो घर का कोई एक सदस्य घंटो भर इतनी अंधाधूंध पूजन-पाठ करता हैं कि घर के सभी लोगों के जीवन पर इसका इतना प्रतिकूलप्रभाव पडता हैं जिससे घर के सदस्यों का जीना हराम हो जाता हैं।

 निवेदन:- मेरा मतलब ये नहीं है कि आप पूजा-पाठ करना छोड दो परंतु जो भी पूजन करो सही तरीके से करो। पूजन-पाठ करने से पहले सोंचे की आपको आपके द्वारा की गई पूजन-पाठ फल रही हैं अथवा नहीं अर्थात् आपको मनचाहा परिणाम मिल रहा है अथवा नहीं। जैसे मेडिकल स्टोर में रखी हुई सभी दवाईयां सबको नहीं फल सकती ठिक उसी प्रकार सभी देवी-देवताओं की पूजन-पाठ सबको नहीं फल सकती। 

कृपया ऐसी पूजन-पाठ किजिए जिससे आपका भला हो नकि पूरा परिवार दुखी होने लग जाए। पूजन-पाठ में गलतियां होने से कई बार बनते-बनते काम बिगडने लग जाते हैं अथवा कार्यों में भयंकर रूकावटें आने लग जाती हैं। 

यदि शास्त्रों के अनुसार पूजन-पाठ करोगे तो ही सुखी रह पाओगे अन्यथा मनमानी पूजन-पाठ करते हुए और दुखी रहते हुए तो आपको बरसों हो ही गये हैं। जानें कुछ शास्त्रों में पूजन-पाठ करने  आवश्यक नियम

1          घर में दो शिवलिंग, तीन गणेशजी, दो शंख, दो सूर्य, तीन दुर्गामूर्ति, दो शालीग्रामजी होने से गृहस्थ मनुष्य को दुख एवं अशान्ति प्राप्त होती है। ......(आचारप्रकाश, आचारेन्दु)

2          घर में टूटी-फूटी अथवा अग्नि से जली हुई प्रतिमा की पूजा नहीं करना चाहिए। ऐसी मूर्ति की पूजा करने से गृहस्थस्वामी के मन में उद्वेग या अनिष्ट होता है। ........(वराहपुराण 186/43)

3          घर में अंगूठे के पर्व से लेकर एक बित्ता परिमाण की ही प्रतिमा होनी चाहिए। इससे बडी प्रतिमा होने से घर में अशुभ होता है। ........(मत्स्यपुराण 258/22)

4              दुर्गा सप्तशती का एक-एक मंत्र तांत्रिक है इसका पाठ बडी सावधानी से करना चाहिए नहीं जो तांत्रिक लोग तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने में लगते हैं उनमें से कई मर भी जाते हैं या कुछ पागल हो जाते हैं। कहीं ऐसी हालत आपकी हो जाए या आपका घर नर्क बन जाए या आपका घर स्वर्ग की जगह श्मशान हो जाए। क्योंकि तांत्रिक सिद्धियां श्मशाम में ही कि जाती है। यदि दुर्गाजी, कालिका जी या अन्य किसी भी माता जी की थोडी-बहुत पूजा-पाठ घर में करते हैं तो बडी सावधानी से करें नहीं तो पूजा में कि गई छोटी सी गलती भी आपको परेशान कर सकती हैं। आपके घर के लोग ही आपके दुश्मन बन जाऐगें। फिर आपके लिए समस्याओं और शत्रुओं की कमी नहीं रहेगीं। आपको क्रोध बहुत ज्यादा आयेगा आपको शारीरिक पीडा अर्थात् कभी हाथ दर्द कभी पैर दर्द तो कभी पूरा शरीर दर्द करने लगेगा अर्थात् आप सदैव बीमार रहेगें। कभी-कभी तो माताजी की पूजा में गलतियां करने का इतना भयंकर परिणाम प्राप्त होता हैं कि घर का कोई सदस्य पागल हो जाता हैं अथवा घर में किसी की अकालमृत्यु तक भी हो जाती है।  

5          हनुमानजी के पूजन में अधिक से अधिक ब्रहमर्च का पालन करें। एक नारी सदा ब्रहमचारी जैसी भावना मन में रखें एवं सभी स्त्रीयों के लिए पवित्र विचार रखें। मन का पवित्र होना अनिवार्य है। मांस, मदिरा का सेवन करें।

6          संतोषी माता के व्रत में शुक्रवार को यदि आप खटाई खाते हैं या आपके घर में कोई भी खटाई खाता है तो घर में अनर्थ होने लगता है।

7          जीवन में कितने ही लोग व्रत करते हैं, परंतु व्रत का उद्यापन नहीं कर पाते। व्रत की पूर्णता के लिए उद्यापन अवश्य करना चाहिए, जो ऐसा नहीं करता उसका वह व्रत निष्फल हो जाता है। नंदीपुराण एवं निर्णयसिंधु

 

8          बिना तिलक के जो भी सत्कर्म किया जाता वह सफल नहीं हो पाता। ... प्रयोगपारिजात।

9          चांदी पितरों को तो परमप्रिय है, पर देवकार्य में इसे अशुभ माना गया है। इसलिए देवकार्य में चांदी को दूर रखना चाहिए। .... मत्स्यपुराण 17/23, निर्णयसिंधु 1

10        नवरात्री में 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष की कन्या की ही पूजा करनी चाहिए। इससे उपर अवस्थावाली कन्या की पूजा नहीं करनी चाहिए। वह सभी कार्यों में निन्द्य मानी जाती है। देवीभागवत 3/26/40-43

11        श्राद्ध के अवसर पर ब्राहमण को निमन्त्रित करना आवश्यक है। जो बिना ब्राहमण के श्राद्ध करता है, उसके घर पितर भोजन नहीं करते तथा शाप देकर लौट जाते हैं। ब्राहमणहीन श्राद्ध करने से मनुष्य महापापी होता है। पद्मपुराण, भूमि. 67/29-31

12        इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेत्कालिदक्षिणाम्। शतलक्षं प्रजाप्यापि तस्य विद्या सिध्यति। शस्त्रघातमाप्नोति सोचिरान्मृत्युमाप्नुयात्।।

भावार्थ:- इस काली कवच को जाने बिना जो कोई भी काली मन्त्र का जप करता है, सौ लाख जप करने से भी उसको सिद्धि प्राप्त नहीं होती, वह पुरूष शीघ्र ही शस्त्राघात से प्राण त्याग करता है। अर्थात् उसकी अकालमृत्यु हो जाती है। 

 यदि आप पूजन-पाठ कर-करके या करा-करा कर थक चुके हैं तथा पत्रिका दिखा-दिखाकर आप भी आधे ज्योतिष बन चुके हैं परंतु आपको लाभ नहीं हुआ है या आपको संदेह है कि बुरे ग्रहों के कारण जीवन में समस्याऐं तो रही हैं परंतु अच्छे ग्रहों से कोई लाभ नहीं हो रहा है एवं अब तक जीवन में सुख नहीं मिला है तो निराश होने की जरूरत नहीं है वास्तव में आपको सही राह नहीं मिली।यदि आप मेरी बातों से सहमत हैं जो कि वेदों-शास्त्रों एवं पुराणों के अंतर्गत हैं तो इसे उन लोगों तक जरूर पहुंचायें जो वास्तव में सुखी होना चाहते हैं और जिन्हें इन बातों की जानकारी नहीं हैं। 

 हमारे जीवन में एक के बाद एक समस्याऐं क्यों आती हैं?

1. पितृदोष के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता हैं।  

पितृदोष के कारण हमारे घरों मंे छोटी-छोटी बातों पर लडाईयां होती हैं। पारिवारीक एकता समाप्त हो जाती हैं। यदि अधिक पितृदोष होता है तो वार-त्यौहारों पर भी लडाईयां होती हैं। जिन परिवारों में पितृदोष रहता हैं वहां से सुख-शांति एवं बरकत दोनो ही चलीं जाती हैं। धन कितना भी कमाओ टिकता ही नहीं हैं। पितृदोष के कारण विवाह-सगाई आदि मंे भी भयंकर रूकावटें आने लग जाती हैं। फिर योग्यता होते हुए भी नौकरी नहीं मिलती हैं अथवा घर के किसी सदस्य का मन कमाने में नहीं लगता हैं। अथवा संतान बिगड जाती हैं। अति-पितृदोष के कारण पति-पत्नि कभी भी सुख से नहीं रह पाते हैं। पितृदोष के कारण बेटा दुखी रहता हैं या बहू घर छोडकर चली जाती हैं। अथवा विवाह के बाद बेटी दुखी रहती हैं या पिता के घर आ जाती हैं। फिर धन अथवा संतान से सुख नहीं मिल पाता हैं। धन व्यर्थ के कार्यों में अधिक खर्च होने लगता हैं। ऋण, बीमारीयां, दुर्घटनाऐं, शत्रुओं से आयेदिन विवाद, पुलिस, कोर्ट-कचहरी के चक्कर आदि समस्याऐं होना आम बात हो जाती हैं। जिन घरों में पितृदोष रहता हैं वहां इनमें से एक न एक समस्या अवश्य रहती हैं। फिर पितृदोष बढता ही जाता हैं एवं मरते दम तक समस्याऐं पीछा नहीं छोडती हैं। जिन घरों में अकालमृत्यु हो जाती हैं अथवा मां-बाप से पहले बच्चे मर जाते हैं वहां पितृदोष अवश्य होता हैं। घर के किसी सदस्य को कभी-कभी सपने में यदि सांप दिखाई देते हों अथवा मरे हुए पूर्वज दिखाई देते हों तो यह पितृदोष का बहुत बडा संकेत होता हैं। पितृशांति तथा पितृमोक्ष में बहुत अधिक अंतर होता हैं। पितृमोक्ष होने से जीवन की संपूर्ण समस्याऐं धीरे-धीरे अपने-आप हल होने लग जाती हैं। अन्यथा एक समस्या दूर करो तो दूसरी समस्या तुरंत खडी हो जाती हैं। याद रखिए समस्याओं का कारण दूर नहीं होगा तो समस्याऐं बढती ही जाएगीं कम नहीं होगीं।  

2. तांत्रिक क्रियाऐं जीवन को नर्क बना देती हैं।

विद्वेषण जैसी खतरनाक तांत्रिक क्रियाओं द्वारा पति-पत्नि में झगडे करवा दिए जाते हैं फिर वे ही एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। ताडन जैसी भयानक तांत्रिक क्रियाओं द्वारा व्यक्ति को बीमार कर दिया जाता हैं। फिर बीमारी ही पकड में नहीं आती है अथवा इलाज करवा-करवा कर थक जाते हैं फिर भी लाभ नहीं होता हैं। स्तंभन जैसी तांत्रिक क्रियाओं एवं टूने-टोटकों द्वारा व्यापार-व्यवसाय ट्रक-बस खेती आदि को बंाध दिया जाता है जिससे धन की आवक एवं ग्राहकी कम हो जाती हैं। कर्ज बढता ही जाता हैं एवं अंत में लाखों-करोडों का घाटा हो जाता हैं। मारण प्रयोग अर्थात् मूठ द्वारा व्यक्ति को मार दिया जाता है। ठंडी मूठ मार दी जाती है तो व्यक्ति बहुत समय तक बीमार रहता है फिर तडप-तडप कर मर जाता है। उच्चटान जैसी तांत्रिक क्रियाऐं एवं टूने-टोटके घरों में कर दिये जाते हैं तो फिर घरों में उच्चाटन होने लग जाता है अर्थात् घरों में छोटी-छोटी बातों पर लडाई-झगडे होने लग जाते हैं। फिर घर से सुख-शांति एवं बरकत दोनो ही चली जाती हैं। फिर धन व्यर्थ के कार्यों में ही खर्च होता रहता है। परिणामस्वरूप धीरे-धीरे पूरा घर बर्बाद हो जाता हैं। वशीकरण द्वारा स्त्री-पुरूषों अथवा लडके-लडकियों को वश में कर लिया जाता है अर्थात् उनकी बुद्धि बांध दी जाती है जिससे वे वही करते हैं जो उन्हे वश में करने वाला कहता हैं। वश में किया हुआ व्यक्ति अपना भला-बुरा कुछ भी नहीं समझ पाता हैं। वह व्यक्ति मान-मर्यादा को त्यागकर कई गलत कदम उठा लेता हैं। परिणाम यह होता है कि जीवन नर्क बन जाता हैं। तांत्रिक मंत्रों द्वारा कुछ वस्तु सिद्ध कर लि जाती है फिर उसे मिठाई शराब अथवा पान में खिला दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि व्यक्ति में शराब दूसरी स्त्रियों अथवा वैश्याओं का संग जैसी कई बुरी आदतंे जाती है। फिर उस व्यक्ति के कारण घर वालों का जीना हराम हो जाता है। तांत्रिक क्रियाओं द्वारा स्त्रीयों की कोख भी बांध दि जाती है फिर उन्हें कभी संतान नहीं हो पाती हैं। कई बार मारण प्रयोग डिलेवरी के समय कर दिया जाता है तो बच्चा जन्म लेने के बाद बीमार हो जाता हैं एवं कभी-कभी तो उसकी अकालमृत्यु भी हो जाती हैं।  तांत्रिक क्रियाओं द्वारा स्त्रीयों के मासीक धर्म संबंधी रोग गुप्त रोग एवं असाध्य रोग भी उत्पन्न कर दिये जाते हैं। जैसे कांटे से ही कांटा निकलता है तलवार से नहीं। ठिक उसी प्रकार तांत्रिक क्रियाओं की शांति केवल तांत्रिक मंत्रों द्वारा ही हो सकती हैं। दान-पुण्य पूजन-पाठ करवाने से नहीं। यदि तांत्रिक क्रियाओं का निराकरण या समाधान समय पर नहीं होता है तो व्यक्ति मौत के मुंह में पहंुच जाता है व्यापार-व्यवसाय खेती सब कुछ बरबाद हो जाता हैं एवं जीवन नर्क बन जाता हैं। 

 

3. कालसर्प दोष कार्यों एवं उन्नति में सबसे बडा बाधक होता हैं।       

जिस व्यक्ति की जन्मकुंडली या जन्मपत्रिका में कालसर्प दोष होता हैं उसके भाग्योदय नहीं हो पाता हैं। विद्या प्राप्ति में बाधाऐं आती हैं। विवाह नहीं हो पाता अथवा वैवाहिक संबंध टूट जाते है। मन में सदैव निराशा बनी रहती है। व्यक्ति अधिक परिश्रम करने के बाद भी धन का संचय नहीं कर पाता। व्यक्ति सदैव किसी किसी रोग से ग्रस्त रहता है। एक के बाद एक मुसीबतों का सामना करना पडता हैं।  भयंकर कठिनाई में जीवन व्यतीत होता हैं। आत्महत्या के विचार आते हैं। व्यक्ति का जीवन संघर्षमय होता है। सदैव आर्थिक संकट से परेशान होना पडता हैं। अत्यधिक खर्च होता रहता हैं। दिमाग में गुस्सा भरा रहता है। व्यक्ति हमेशा कर्ज के बोझ सेें दबा रहता है। नौकरी में पदोन्नति नहीं होती है। कोर्ट.कचहरी में हानी उठानी पडती है। हमेशा असफलता मिलती है।

 

4. मंागलिक होने के कारण शादी में रूकावटें तथा विवाह के बाद का जीवन दुखी रहता हैं।

मंगल दोष के कारण विवाह-सगाई में भयंकर रूकावटें आती हैं। रिश्ते नहीं होते या बतने-बनते टूट जाते हैं। विवाह के बाद भी पति-पत्नि के जीवन में हमेश मनमुटाव, क्लेश एवं अशांति बनी

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